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चुदाई का मौसम 3

चुदाई का मौसम – Indian Sex Story – 3
वो इठलाती बलखाती धीरे से बॉब्बी के पास आई ? इस डुआरान उसकी निघाएँ बॉब्बी के लॉड को दूउर से ही सहला रही थी , पर वो बेचारा फिर भी अतृप्त था …… पास आकर दीक्षा ने बॉब्बी के गालों पे एक हल्का सा चुंबन जड़ दिया ………..

चुदाई का मौसम

बॉब्बी के बाल खड़े हो गये
दीक्षा ने बड़े शराराती अंदाज़ मैं कहा .

” मैं तो जा रही हूँ ! , तुम अपना अधूरा काम इतमीनान से पूरा कर लो . ”

बॉब्बी बेचारा शर्म से ज़मीन मैं गाड़े जा रहा था . इतने मैं अचानक दीक्षा ने जाते जाते अपने भरे हुए रेशमी हसीन गुलाबी होंठ उसके गाल पे चिपका कर एक गहरा किस दे दिया

उसके जाते ही बॉब्बी का तननाया हुआ लॅंड अपनी औकात पर आ गया ….उस्सीए एब्ब बर्दाश्टत नही हुआ और एक घाघराती आवाज़ के साथ उसने पिशाब की जगह वीरया की एक बौछार सामने रखे कापड़ूँ के ढेर पर करदी ………..
झड़ने के बाद बहुत देर तक बाथरूम मैं पड़े रहने के बाद बॉब्बी अचनाम से होश मैं आया और उसने अपनी हालत देखी ………वो एक दम से उठ कर पहले अपने को सॉफ करने लगा ….फिर उसने अपना भीगा हुआ अंडरवियर उतरा और वॉशिंग मशीन मैं डाल दिया ………और सिर्फ़ पेंट पहन कर बाहर जाने लगा ……..बिना इस बात पर ध्यान दिए की बाथरूम मैं जो कपड़ो का ढेर था यूयेसेस पर उसने अपना कारनामा कर के छोड़ दिया था ……..अब वो लगभग लड़खदाता हुआ हॉल मैं घुसा …अपार्टमेंट एक दम खाली था ……ना चाची और ना ही उसके चाचा या कज़िन भाई नज़र आ रहे थे ……. कुछ देर ऐसे ही खड़े रहने के बाद वो अपने फर्स्ट फ्लोर वाले रूम मैं जाकर सो गया ……..

जब बॉब्बी उठा तो शाम ढाल रही थी ………उसने महसूस कििया की थकान और नींद के कारण वो सोता ही रह गया था और उसने अपना लंच भी मिस कर दिया था ……नीचे जाकर उसने किचन मैं टटोला तो उससे अपना खाना धक्का हुआ मिला ……और एक चिट भी चिपकी हुई मिली जिस पर लिखा था …..‚ खाना ठीक से खा लेना , हम लोग शॉपिंग के लिए शाहर जा रहें हैं रात तक आ जाएँगे . ‘ ………और उसने गौर किया की वो लिखावट उसकी मा की नही थी ……बल्कि यह लिखावट तो दीक्षा चाची की थी ………. अंधेरे हॉल मैं अकेले बैठ कर उसने लंच फिनिश किया ………….उसके बाद खाली अपार्टमेंट और अकेलापन उससे कातने को दौड़ने लगा ……हारकर उसने सोचा क्यू ना गाव जाकर फार्म पर काम करने वाले लड़कोन से मिल आओं …………….तो वो तयार होकर गाव चला गया …. चुदाई का मौसम

गाओं पहूचकर उससे पता चला की फार्म के सारे लड़के तो शाम की छुट्टी मिलने की वजह से पास के कस्बे मैं मेला देखने गये थे ……….ये लो यहाँ भी तन्हाई ……..तभी उससे ध्यान आया की कालुआ तो यूयेसेस गाव मैं नही रहता था वो पास की पाहरी पर बने मंदिर के पीछे रहता था ……उसने सोचा चलो वहाँ ट्राइ किया जाई ……..

काफ़ी भागदौड़ के बाद बॉब्बी पहाड़ी पर पहुचा , वो काफ़ी सुनसान इलाक़ा था , लोग सिर्फ़ ख़ास दीनो पर मंदिर के दर्शन करने जया करते थे …बॉब्बी धीरे धीरे मंदिर के पीछे बने हुए एक पक्के कॉटेज तक पहुचा ……यह कालुआ की फॅमिली का कॉटेज था ……कालुआ के परवार मैं उसकी मा , छोटा भाई जो की करीब 18 का था और कालुआ खुद रहता था ………कालुआ के पिताजी के बड़े मैं बॉब्बी को कुछ नही पता था

कालुआ के घर का दरवाजा तो बाहर से लॉक था यह देख बॉब्बी ने सोचा , आज दिन ही खराब है ‘ ……फिर भी बिना किसी आश्या के वो इधर उधर भटकने के बाद कालुआ के कॉटेज के पीछे क्लि तरफ पहुचा ………वहाँ दूउर से उसे खिड़की के शीशे मैं कुछ परचाय हिलती हुई दिखी ………कौतूलवश वो उधर चल पड़ा …….पास जाने पर उससे कुछ मिल्ली जुल्ली आवाज़ें सुनाई डी……..जैसे कुछ स्त्री और पूरेुष कुश्ती लड़ रहे हों ……..उसने झुक उकड़ू बैठ कर धीरे से खिड़की के पल्ले के नीचे से झाँक कर देखा …………आज यूयेसेस दिन मैं तीसरी बार ऐसा हुआ की बॉब्बी के होश फाख्ता हो गये ………..

बॉब्बी ने अभी सिर्फ़ चुदाई सुनी और आज पहली बार देखी भी थी ……पर उससे ये उमईएड नही थी की आज उसका एक्सपीरियेन्स इतना बढ़ जाएगा ………………………अंदर एक हल्के नीले बल्ब की रोशनी मैं टीन लोग जन्मजात नंगे मौजूद थे …………. चुदाई का मौसम

पहला तो बॉब्बी एक दम पहचान गया …वो कालुआ था .
दूसरी एक औरात थी उसको भी बॉब्बी पहचान गया ….वो कालुआ की मा ‘ठुमरी‚ थी , जो कभी कभी उसकी चाची की मदद करने फार्म पर आती थी ….

तीसरा एक नवयुवक था , शकल सूरात मैं कालुआ जैसा लग रहा था , पर लंबाई मैं उससे छ्होटा था .

पर अंदर जो चल रहा था उससे देख कर उसकी साँस गुम हो गयी , माता पसीने से भर गया , और जीभ सूख गयी…….अंदर ……… चुदाई का मौसम

ठुमरी बिल्कुल नंगी घुतनो के बाल बैठी थी …….उसके मूठे मूठे पपीते जैसे मुममे आगे पीछे थिरक रहे था …..कारण था कालुआ का उसके पीछे खड़े होकर धक्के लगाना ……सामने खड़ा होने की वजह से बॉब्बी को यह नही दिख रहा था वो धक्के क्यू और कहा लगा रहा था …और ना ही बॉब्बी को इतना सेक्स का अनुभव था की वो समझ पाए की वहाँ कालुआ अपनी मा ठुमरी की चुत मैं लॅंड पेल रहा था और वो भी पीछे से …….. ठुमरी के आगे वो तीसरा लड़का खड़ा था जिसका लंबा कला मोटा लॅंड ठुमरी के मूह मैं घुसा हुआ था ………..और ठुमरी के लाअल होंठ उसके चारो तरफ लिपटे हुए थे ….ठुमरी घु घु की आवाज़ करते हुए उसस्स लॉड पर अपने होंठ आगे पीछे कर रही थी …….और उससी लेए मैं कालुआ ठुमरी की कमर पकड़ कर आगे पीछे होते हुए ठुमरी को ज़ोरदार धक्के मार रहा था ……………..

बॉब्बी का लॅंड ठुमरी के नग्न बदन को देखकर खड़ा हो गया था …पर उससे यह समझ नही आया की कालुआ अपनी मा के सामने नंगा होकर टिनी बेशर्मी से क्या कर रहा था ……और ना ही उससे पता था की वो दूसरा ल्डका कौन था .और वो कालुआ के सामने ही उसकी मा के साथ ऐसा कैसे कर सकता था , कालुआ उससे रोक क्यू नही रहा था , उल्टे वो तो खुद ही अजीब हारकर्ते कर रहा था , बॉब्बी को यूयेसेस समय ‘डॉगी स्टाइल ‘ के बड़े मैं नही पता था ………. चुदाई का मौसम

अंदर सारी दुनिया से बेख़बर वो तीनो मदमस्त चुदाई नशे मैं छुउर नज़र आ रहे थे ……दोनो लड़का घूर घूर करते हुए आगे पीछे होकर धक्के पे धक्के मार रहे थे ….बीच बीच मैं ज़ोरों से सिशकभी रहे थे ………पूरे कमरे में फूच फूच फूच फूच की धुआंडार आवाज़ें गूँज रही तीन ….तीनों के तीनों पसीने लथपथ थे ……….वो दूसरा लड़का अपने हाथ से ठुमरी की बालों को कस के भीच रहा था ……कालुआ ने अपने हाथ सरकते हुए ठुमरी की भारी हुई गान्ड को कस के मसल रहा था …और ‘टदाअक टदाअक ‘ …..कस कस के जोरों से थप्पड़ बजा रहा था ठुमरी की मुलायम अवाम फूली हुई गान्ड पर ……. ठुमरी भी बजाए अपने को बचाने के ….अपनी गान्ड को पीछे कर कर करके हिला रही थी जैसे वहाँ कोई चीज़ हो जो उससे अपनी गान्ड मैं भरपर परम संतुष्टि की चाह हो ……… ऐसा लग रहा था की मानो इंसान नही कोई जानवरों का झुंड आपस मैं भिड़ा हुआ था ………..और हो भी क्यू ना जब वासना का नशा आदमी पर चढ़ता है तो जानवर को भी पीछे छोड़ देता है ………… चुदाई का मौसम

धक्के और सिसकार्रियों का सिलसिला अपने पूरे चरम पर था …..अंदर कमरे का तापमान किसी भट्टी की तरह बढ़ा हुआ लग रहा था ……वासना की गर्मी का तूफान थमने का नाम ही नही ले रहा था ………….अचानक ठुमरी ने अपना थिरकना रोक दिया और उसका शरीर कुछ अकड़ सा गया …….उसने अपने मूह से लॅंड निकल दिया और एक ज़ोर की चिंघाड़ मार डी …….साथ ही स्ाआत कालुआ भी जोरों से आआहाहह करते उससे चिपक गया ………….दोनो एक दूसरे से बुरी तरह से चिपक गये , दोनो का पसीना आपस मैं मत नाइतून हो रा था , दोनो गहरी गहरी साँसें ले रहे थे …उनके शरीर शिथिल हो रहे थे ……..ठुमरी अब कालुआ से अलग होकर आगे को गिर पड़ी और हाफने लगी ……….और उसके बाद जो हुआ उससे देख कर बॉब्बी की आँखों के आगे तारे नाचने लगे ………..कालुआ का लॅंड एक बेजान साँप की तरफ उसकी टाँगों के बीच मैं झूल रहा था ……उसमे से एक सफेद और गुलाबी पानी का मिश्रण बह रहा था ….बिल्कुल वैसा ही जैसा बॉब्बी ने आज सुबह जंगल मैं यूयेसेस आदमी के लॉड से बहता देखा था …..
बॉब्बी का सिर चकरा गया ….उसके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया …….एक तरफ तो उसका लॅंड अंदर की रासलीला देखकर मचल रहा था , पेंट फाड़ने को तयार था और दूसरी तरफ जो उसने आज देखा था वो उसके दिमाग़ और सोच की पहुच से बाहर था …………….. वो खिड़की के नीचे बिठा सोच ही रा था की ….

चुदाई का मौसम – incestsexstories.in
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